कंपनी के अंदर के मूल्य पर ही रहने लगे, तो अपनी रूपरेखा, कंपनी की शक्ल में बदल जाती है।
बिना सोचे, सिर्फ कंपनी की भाषा बढ़ती है, बाहर की बातें घटती हैं।
चालीस के दशक में एक व्यक्ति को यह महसूस हुआ, और छः महीने में एक छोटी सी मीटिंग शुरू की।
तीन आदमी, अलग-अलग काम, पास-पास के अनुभव।
पाँच साल तक ये चलता रहा - अब, कंपनी का आधिकार बदल गया भी, पर वह खुद अडिग है।

